कहानियाँ और कविताएँ



तारा का तारा टाइम मशीन 
(पहला ड्राफ्ट)
- पीयुष कुमार कश्यप | ३० जून,२०१२ - ७ जुलाई, २०१२

परिचय

किसी अजीब से पुराने कारखाने का दृश्य, सब कुछ स्थिर है, न हवा बह रही है, न आसमान के बादल आगे बढ़ रहे हैं | एक अजीब सा शोर है और बिजली जैसी तेज रौशनी की चमक भक्भुकाती चारों ओर पड़ रही है |
वह सोच रहा था
“बिना किसी ख्याल का, मानो शून्य से जन्मा एक नाम मन में आया और फिर ख्यालों की भीड़ लगा दी | यह नाम यानी तारा का तारा टाइम मशीन कोई ऐसी माया है जिसमे कल्पना खुद को मुक्त महसूस करती है | यह दुनिया में होते हुए भी दुनियादारी से मुक्त है | शायद किसी मायावी शीशे में दुनिया का प्रतिबिम्ब हों या फिर किसी दिमाग में दुनिया का स्वप्न |
सच भी नही, झूठ भी नही, बस है - जैसे माया की स्वयं कोई परिभाषा !”
उसने सब को झुकी नज़रों से देखा, मगर काफी इतमिनान से, फिर बोलना शुरू किया,
“२२ बरस के अनजाने मन में बचपन का जिद अभी भी है | पढ़ने-लिखने से कहाँ कुछ सीखा है ? पढाई भी कितनी की है ? कुछ प्रोफेसर्स भी डाट-डपट में कह देते हैं कि अभी तो मैं अनपढ़ हूँ, कुछ जानता ही नहीं ? मैं भी मानता हूँ कि मैं अभी बच्चा हूँ ! बड़े होने की एक्टिंग करते-करते दुनिया कोई टेलीवीजन सीरियल जैसी मालूम पड़ने लगी है | अब बचपना नहीं तो और क्या कर सकता हूँ, बस यहीं आता है ! और बाकी सब कुछ तो नक़ल उतारी बातें हैं दुनिया की | अगर मन से कुछ आता है तो बस यहीं बचपना |”
इतना कह कर वह टाइम मशीन में समाया और सबकी नज़रों से ओझल हो गया | वह कहाँ गया किसी को नही मालूम, टाइम मशीन भी कहाँ गई किसी को नही मालूम | वह अजीब सा पुराना कारखाना बिलकुल खाली हो गया, न शोर, न रौशनी, न वह |
आज से १५ वर्ष पहले, सात साल की उम्र से वह इस टाइम मशीन को बना रहा था | उसके घरवाले बचपन में उसे बाबू कहकर पुकारते थें |

भूमिका

बुजुर्ग क्या बतलाते ? उनकी तो यादास्त कमज़ोर हो गई है टेलीवीजन देख-देख कर | कहानियाँ बड़ी आधी-अधूरी और पहेली नुमा मालूम होती है “तारा का तारा टाइम मशीन” की | बाबू कई सालों से इस खोज मे है | अब तो ऐसा लगता है कि उसके मन की सारी हलचल इसी से है |

कुछ कहानियाँ बतलाती हैं कि “तारा का तारा टाइम मशीन” सावन के मेले में एक झूला हुआ करता था | मगर फिर उस पर प्रतिबन्ध लग गया | वैसे तो मेले में अनेको मायावी चीज़ें दिखती हैं, मगर इसकी माया इतनी बेजोर थी कि नीयम-कानून का फैसला करने वालों ने इसे बंद कर देना हीं ठीक समझा | एक कहानी तो ऐसी है कि एक आदमी ने इस टाइम मशीन में खुद कि मृत्यु देख ली – अपनी ही आत्मा रहित शरीर को जलते हुए देखा | जब वह वापस इस दुनिया में आया तो वह समझ न सका की हकीकत क्या है – वह पागल हो गया | शायद लोग डरने लगे हों टाइम मशीन से, और फिर कितना अरसा बीत गया है उसके लुप्त हुए –अब तो किसी को ज्यादा कुछ याद नहीं |
पूरा शहर एक मेला ही था मगर आज भी | भक्भुकाती बत्तियों से सजा-धजा, अनेको मायावी प्रदर्शनों का प्रेमी यह शहर | मायावी जन्तुयों कि मूर्तियाँ, लाउड-स्पीकर पर बजते अजीबो गरीब नारे, बेतरतीब मायावी कहानियाँ – पूरा शहर इन्ही को समर्पित है | लोग बड़ी सुनी-सुनाई बातें करते, उनके विश्वासों की दुनिया जिन्हें वे आलौकिक प्रकाश से दमकता समझते, मेरी मानो तो हकीकत में कोई अँधेरी नगरी है | बाबू ने सोचा – कल्पना क्या है और क्या मैं उसपर विश्वास कर सकता हूँ ? कल्पना भी तो बेतरतीब हीं होती है !

माया बड़ी मायावी है और सब कुछ इसी के अंतरगत है इन्द्रियों से जान पड़ने वाली इस दुनिया में | बाबू भी इसी माया का एक हिस्सा है| भले हीं उसके विश्वास का केंद्र लोगों से थोड़ा अलग हो मगर उसकी कल्पना में तत्व तो इसी दुनिया के हैं | शायद “तारा का तारा टाइम मशीन” इस माया से ऊपर किसी और महामाया का हिस्सा हो | ऐसा हुआ तो बाबू ज़रूर हीं इस दुनिया से एक कदम आगे बढ़ जाएगा, मगर फिर भी वह किसी महामाया के अंतरगत ही होगा |

क्या समय ब्रम्ह का हिस्सा है ? अगर ऐसा हुआ तो टाइम मशीन माया-मुक्त वास्तविक्ता में आपको समय कि सैर करा सकती है ! मगर ऐसा सोचना भी मुश्किल है – न बाबू माया से मुक्त है और न ब्रम्ह उसकी समझ के योग्य | मगर वह कोशिश तो ज़रूर करेगा !
माया मुक्त वास्तविक्ता की खोज में ही उसे टाइम मशीन के बारे में पता चला है | अब एक तरफ शून्य है और एक तरफ अथाह कल्पना |
इनके बीच की दूरी कोई सीधी लकीर नहीं बल्कि कोई झूमती तरंग है | ऐसी है बाबू की खोज – अत्यंत मायावी “तारा का तारा टाइम मशीन” की खोज !
                                                                                   
कहानियाँ

(  एक  )

बाहर जोरों की बारिश हो रही थी सुबह से – अभी तक नहीं रुकी | जीवन अस्त-व्यस्त था | कमरे में रस्सी बांध कर पंखे की हवा में कपड़े सुखाए जा रहे थे | इसी बीच बैठ कर बाबू पढ़ने की कोशिश कर रहा था |
स्नेहा ने बाबू से पूछा, “तुम्हे पता है इतनी बारिश में बन्दर कहाँ गया होगा ?”
बाबू ने फट से जबाब दिया, “डाक्टर दादा के टंकी वाले छत पर टीन लगा है , उसी के नीचे बैठा होगा |”
इतना सुनकर स्नेहा चुप-चाप बाबू को देख मुस्कुराने लगी | बाबू यह जान गया था की स्नेहा में दिमाग में कोई खुराफात ज़रूर चल रही है | स्नेहा ने अचानक हँसी में टूटकर कहा, “अरे वाह बाबू, तुम तो बिलकुल बन्दर की तरह सोचते हो !” वह झट से भाग गई |
बाबू ने वापस किताब कि ओर रुख किया मगर एक दो शब्दों मे ही उसका ध्यान कहीं खो गया | दोपहर के इस मन को उसी बन्दर का चेहरा याद आने लगा | ऐसा लगा मानो उसके और बन्दर के बीच कोई घनिष्ठ बात है | मानो वह अपने कमरे में न होके उस बन्दर के साथ डाक्टर दादा की छत पर बैठा बारिश को देख रहा हो |
बारिश को रुके कुछ देर हो गई थी | हलकी धूप भी निकल आई थी | माँ कमरे से लगी रस्सी से कपड़े वापस उतार रही थी, छत पर वापस पसारने के लिए | बाबू का मन अभी भी पढाई में नहीं लग रहा था |
वह सोच रहा था – क्या वह वाकई में बन्दर की तरह सोचता है ?   

(  दो  )

बारिश हुई तो क्या हुआ ? ... होगा क्या, बादल पानी में मिल गए !
पानी बहता है – सो एक और जमा हो गया है, जहाँ सतह नीची हो | एक तरफ बादल बड़ा साफ़ दिखते – मगर थोड़ी दूर चल कर वे पानी में घुल उन्ही तरंगों में तरंगित हो जाते | घर के बाकी बच्चे क्रिकेट खेल रहे थें ज़मीन पर – जहाँ बाबू लेटा है वहाँ एक दरार सी है | तभी गेंद टिप्पा खाती बाबू को फांद कर जाती है – उसके पीछे भागता गुटलू भी बाबू को फांद कर जाता है | पानी में तरंगे पैदा होती हैं और बादल का प्रतिबिम्ब भी तरंगित हो जाता है | दुनिया की चहल-पहल तो बारिश के बाद वापस शुरू हो गई है मगर मानो इस मन में कोई गढ्ढा था जहाँ पानी जमा हो गया है और सारी ध्वनियाँ इसी पानी में भीगकर नम हो गई हैं | ऊपर छत पर एक गमला टूट गया है , मटमैला पानी आस पास ज़मा है | एकआत बूंदे अभी भी न जाने कहाँ से बरस जाती हैं | बादलों को तरंगित भी इन्ही एक आत बूंदों ने किया है |
बाबू भी जमे पानी में तरंगे बनाने लगा – बादल और घुलते गए | कुछ देर में सब कुछ एकदम विचित्र सा हो गया, मानो दृश्य कोई तरंग बन गए हों | बादल इस कदर घुले कि उनका कोई स्वरुप नही रहा ,अब तो लगता है कि वे तैरती रेखाएँ हैं |
एक लय था कल्पना कि कविता और हकीकत की कहानी का आपस में मिलने का |
बाबू अभी भी लेटा था उसी जगह और गुटलू पलंग के नीचे अपनी गेंद खोज रहा था | दोनों की आँखें मिलती हैं – बिजली चली जाती है – बादल फिर से गरजते हैं – माँ ‘धुत तेरी का’ का शोर करते हुए चुहानी से बाहर भागती हैं |
डाक्टर दादा के छत पर बैठा बंदर देख रहा है आसमान को – बारिश फिर से होने वाली है ! बाबू भी दौड़ कर बगल से बगल वाली छत पर जाता है जहाँ उसने अपने कंचों का डब्बा छुपाया हुआ है | डब्बा खोल कर वह कंचों को देखता है फिर बंद कर वहीं रख देता है |

(  तीन  )

मन में चक्कर काटता कोई ख्याल समझ नहीं आता – एक पल आता भी तो फिर दूसरे पल नही | दीवार पर जैसे घड़ी की सुई चक्कर में घूमती, और जैसे पृथ्वी सूरज के चक्क्कर काटती, वैसे हीं बाबू भी किसी चक्कर में फँसा हो मानो | अपने सामने उसने एक खुला दरवाज़ा देखा – वह उसमे गया तो ऐसा लगा मनो मन का कोई दरवाज़ा सामने खुला हो | न जाने कितनी बार वह उसी दरवाज़े से निकल, मगर वापस खुद को उसी खुले दरवाज़े के सामने पाता | फिर कुछ सोच कर उसने पीछे देखा | शायद वह समझ गया है कि उसका मन किसी ख्याल चक्र में है |

उसने सोचा – आखिर समय को पहिया क्यों कहते हैं लोग ?

(  चार  )

रात का पहला पहर, छुटकी दादी माँ के कमरे में, दादी माँ के बगल में लेटी नींद लगने के इन्तेज़ार में थी | दोनों एक दूसरे से ज्यादा बातें नहीं करते | दादी माँ अपने मन में कुछ सोच रही थी और छुटकी अपने मन में | एकबार छुटकी ने दादी को बोला था कोई कहानी सुनाने को, मगर दादी कोई भी कहानी याद न आई | दादी माँ इधर उधर की बातें बुदबुदाने लगी | इसके बाद छुटकी ने तो कभी दोबारा नहीं बोला उन्हें कहानी सुनाने को, मगर शायद दादी माँ की बुढ़ापे की आदत थी कि वह कभी-कभी कुछ भी खुद से बोलने लग जाती |
दोनों आँखें बंद थी – पास में कहीं पानी टप-टप करता नल से गिर रहा था – कमरे में और कोई आवाज़ न थी, बस अँधेरे का सन्नाटा था | अचानक किसी बिल्ली कि मिआव सुनाई दी और छुटकी थोड़ी सहम सी गई – थोड़ा सरक कर दादी माँ के पास गई और फिर आँखें बंद कर ली अपनी | छत छप्पर का था - छप्पर और टीन के बीच थोड़ी जगह थी जहाँ बैठी एक काली बिल्ली कि दो आँखें इधर उधर ताक रही थी | दादी माँ कि आँखें खुली और वह छप्पर को देखने लगी |
उन्होंने आँखें बंद करी और बोलना शुरू किया
“काहें डरती है, इ तो बिल्ली है, कितने दिन से आती है इन्हा पर, पहिले नहीं देखा ? इसकी माँ भी आती थी इसके पहले |” वह थोड़ी देर चुप रही, फिर कहा, “मेरा कमरा वैसा का वैसा ही है, जबसे हम बिहा कर आए इ घर में... काहें का डर” उनका चेहरा अब बड़ा गंभीर हो गया था और भाव उदास, “कहाँ से आया था और कौन है का पता, कौन आत्मा है कौन भूत है ...हमको इतना कस्ट दिया”
छुटकी अब धीमे खर्राटे लेकर सो रही थी | दादी माँ की आँखें खुली -  आँखों से पानी कि कुछ बूंदे निकल पड़ी थी जिन्हें अपने आँचल से पोछा, फिर बड़े डर में बोलने लगी, “बरका दालान का दरवाज़ा खुला था – गर्मी का मौसम था – हवा के लिए – उसके पैर का आवाज़ तो नहीं सुनाई देता है मगर कलेजा काँप जाता है खुद में – महसूस होता है कि कोई भयानक सा आया है, मुझौसा – उस दिन वह बिलकुल मेरे बगल तक आया और एक तमाचा मारा मेरा गाल पर – हाय, क्या हाल कर दिया मेरा – आँख खराब हो गया – बाल सफ़ेद  और चेहरा झुर्रियों से भर गया – हाय ! – कैसा लोक भूत-पिचास है |”
दादी माँ हल्का-हल्का रो रही थीं | उन्होंने अपना चेहरा आंचल से पोछा और आँखें बंद कर के फिर कुछ बुदबुदाते हुए सो गई | छुटकी अभी तक कई बार करवटें बदलते बदलते पलंग के किसी और कोने तक चली गई थी | पानी अभी भी टप-टप बह रहा था |

(  पाँच  )

रात को बाबू के नींद खुलती है और वह उठ बैठता है | बड़ी राहत है उसके चेहरे पर, मानो कोई बरसो पुरानी पहेली सुलझी हो | वह अपने बिस्तर से उतर कर अँधेरे गलियारे में गुम जाता है |
अँधेरे में मन की आँखें कुछ दृश्य देखती हैं – एक बिल्ली टीन के छत से छप्पर पर जा रही है, एक सूखे गुलदस्ते से एक सूखा फूल हवा के झोके से दम खाकर गिर जाता है, सीढियां खाली हैं और पानी के फिल्टर से पानी टप-टपाकर गिर रहा है |
जब एक ग्लास पानी पीने के बाद बाबू ने नल से टप-टपाते पानी को बंद किया तो देखा कि दादी माँ को डराने वाला भूत वहीं कमरे के एक कोने में दुबक कर बैठा है | दोनों कि आँखें हामी में मिली और दोनों दादी माँ के बिस्तर के और बढे |
रास्ते में बाबू ने भूत से पूछा, “तुम्हारे शरीर पर इतने बाल क्यों है?” भूत रुक गया और अपने दोनों हाथ जोड़ कर बोला, “आपकी दादी जब बचपन में सावन के मेले में गई थीं, उन्होंने बालों से भरा हुआ एक मुझौसा पहलवान देखा था – उन्हें बड़ा डर लगा ! तब से वह सारे भूतों के बारे में ऐसा हीं सोचती हैं ! बाबू ने एक पल के लिए भूत को बड़ी शक भरी नज़रों से देखा, फिर दोनों आगे बढे |
बिस्तर के एक तरफ बाबू चढकर बैठा और दूसरी तरफ भूत | दोनों दादी को बड़ी गहरी नज़र से देख रहे थें | भूत बोल पड़ता है, “हुआ...आँ...हुआआआ.....”
बाबू बड़े गुस्से से भूत को बोलता है, “इंसानों कि तरह नहीं बोल सकते ?”
एक पल के लिए दोनों एक दूसरे को देखते हैं | दादी माँ अपने ही दुनिया में कुछ बुदबुदा रही थीं | भूत फिर से बोलता है, इंसानों कि भाषा में, मगर भूतों कि कर्कशता के साथ, “बुढिया, बता दे तारा का तारा टाइम मशीन के बारे में तू क्या जानती है ? ... संकोच मत कर ... बता !”
दादी माँ की आँखें बंद थी और वह नींद में ही कापने लगी हलके-हलके, फिर कुछ बुदबुदाना शुरू किया | दोनों दादी माँ के करीब आकर उनकी बात सुनने की कोशिश कर रहे थे | दादी माँ सिसक सिसक कर कह रही थी, “एक बूढा मालिक था तारा का तारा टाइम मशीन का... मशीन बंद होने के बाद वह इस मेले से विरागी हो गया और चला गया गंगा के बीच रेत के टीले पर तपस्या करने... सब लोगों ने सोचा वह आत्म-हत्या कर रहा है... बारिश होगी और गंगा का पानी टीले को डूबा देगा तो वह कहाँ जाएगा ? मगर कई साल बाद भी लोगों ने उसे वहाँ देखा है, कुछ विश्वास करते हैं और कुछ नहीं | कहते हैं, उसने तो टाइम मशीन बनाया है – समय पर विजयी है, उसे कौन मार सकता है”
इतना कह कर वह शांत हो गई | भूत ने बाबू को देखा – उसका काम हो गया था – वह उठकर चला गया वहाँ से | बाबू भी उठकर जा रहा था मगर सोचा एक ग्लास पानी और पी लेना चाहिए | वहीं ग्लास उठाया, उसी जगह पर खड़े होकर – पानी फिर से टप-टप नल से बह रहा था | एक ग्लास पानी पिया और फिर से नल को कस कर बंद किया | ऐसा लगा मनो वह अभी-अभी अपने कमरे से उठकर आया हो बस पानी पीने के लिए |

(  छः  )

बाबू के बिस्तर से एक सीढ़ी सीधा आसमान तक जाती है |
ख्याल एक दृश्य - बाबू के खाली बिस्तर से शुरू होता है | दीवार पर लटकी स्विच के तार के साथ ट्यूबलाइट और पंखे से होते हुए ऊपरी मंजिल पर जाता है – यह मंजिल पर मकान पूरा बना नहीं है, वहाँ रखी एक सीढ़ी से ख्याल चढना शुरू करता है, सीढ़ी पर कोई लता भी चढ रही है, ऊपर से अचानक वहीं बिल्ली कूदती है | ख्याल अब छत पर है – कल रात हुई बारिश से छत अभी भी गीला है – एक टूटे गमले से मिट्टी ज़मीन पर जमे पानी को मटमैला बना रही है – उसमे प्रतिबिंबित हो रहे बादल गायब हो रहे हैं – एक संगीत बजने लगता है – ख्याल उसके छोटेशहर के छितिज से होते हुए आसमान में पहुँचता है – बादल देश में बादल बड़े मायावी दृश्य बना रहे हैं | ख्यालों ने कुछ दूर और सफर किया तो दिखा कि बादलों का रंग काला हो रहा है और उनसे गरजने की आवाजें आ रहे हैं |
( उसी संगीत के साथ ) बाबू कुर्सी पर बैठा सो रहा है और बिजली चली जाती है | पँखा रुक जाता है और पसीने की कुछ बूंदे बाबू के सर पर बन जाती हैं | बाबू की मुट्ठी खुलती है और उसमे से एक कंचा छूट जमीन पर गिर जाता है | बाबू की आँखे आधी खुलती है और वह झट से नीचे उतरता है |
बगल वाले कमरे में बहुत डाट पर रही है – मेज़ पर कोई भगवान जैसे फोटो फ्रेम का काँच टूटा पड़ा है | बाबू दरवाज़े पर जाकर खड़ा हो यह तमाशा देखने लग जाता है | घर के बाकी बच्चे भी गवाहों की तरह एक कोने में चुप-चाप डरे से खड़े हैं | सब कुछ तो ठीक है मगर यह तमाशा किस लिए ? तमाशे का केन्द्र तमाशे में शायद मौजूद नहीं था ! यह सोचते-सोचते हीं जब बाबू ने अपने हाथों को देखा तो एक कटे ताज़े ज़ख्म से खून बाहर निकल कर थोड़ा सूख गया था |
बाबू समझ गया की यह सारे बड़े लोग उसी को डांट रहे हैं | वह बड़ी सहजता से उस तमाशे के बीच में जाता है और ज़मीन पर बैठ कर रोने लग जाता है | दृश्य पूरा होता है जब हकीकत और कल्पना के दो लोक आपस में मिलते हैं !
बाबू आसुओं से लाल अपनी आँखें बंद करता है |

(  सात  )

एक दरवाज़ा खोला तो जाना कि मन में एक ऐसा हीं दरवाज़ा है – उस दरवाज़े को खोला तो एक और दरवाज़ा दिखा – वह दरवज़ा खोलता हीं गया |
कबूतरों के रहने का कमरा था किसी छत पर | उसने देखा तो सोचा की यह दृश्य तो मेरे मन पर बनी कोई फिल्म है ! चार-चार दरवाज़े खुले पड़े हैं और यह कबूतर इस छोटे से कमरे के अंदर हीं इतना कोलाहल कर रहे हैं – इधर-उधर उड़ते और एक दूसरे से टकराते रहते | फिर अचानक एक धमाका हुआ कहीं और सारे कबूतर मानो मन के ख्याल लेकर उड़ गए | नीले आसमान में छितराते सफ़ेद और भूरे कबूतर | रह गया यह अकेला कमरा – चार खुले दरवाजों से आसमान को देखता | सोचता तो क्या सोचता ? ख्याल तो सारे उड़ गए थें !

वह धमाका क्या था जिसने सारे ख्यालों को उड़ा दिया ?

किसी के हँसने की आवाज़ सुनाई दी और थोड़ी दूर कहीं संगीत बजने लगा | कबूतर तो उड़ गए मगर ज़मीन पर उनके टूटे पंख इधर-उधर बिखरे थें | एक हवा का झोका आया – चारो दरवाज़े हिले और कुछ पंख बड़े हलके लय में उड़े | संगीत धीरे-धीरे धीमा हो गया, कबूतर अपने आशिआने में वापस आ रहे थें |

बाबू ने बोला, “वह धमाका तारा का तारा टाइम मशीन से आया था, कोई तो उसके साथ छेड़खानी कर रहा है ... मगर वह कौन हो सकता है भला? ... और कौन जानता है उसके बारे में मुझे छोड़ कर?”

इस सोच डूबा बाबू तो भूल हीं गया कि वह कबूतरों के कमरे में अपने कंचो का डब्बा लेने आया था जो उसने वहीं कहीं छुपा कर रखा है |

(  आठ  )

स्नेहा और बाबू छत पर हैं और रेलिंग पर हाथो को झुलाते शहर को देख रहे हैं | स्नेहा बोल पड़ती है, “बन्दर...
बन्दर दिमाग के अंदर
बन्दर बड़ा सुन्दर
बन्दर, मस्त कलंदर”
बाबू चुप है, वह थोड़ी देर स्नेहा को देखता है फिर ज़मीन पर लेट आसमन की तरफ देखने लगता है - फिर अचानक वह भी बोल पड़ता है, “तुम्हे कैसे पता की मैं बन्दर की तरह सोच सकता हूँ ? तुमने क्या मेरा दिमाग पढ़ा है ?”
स्नेहा आँखें बड़ी-बड़ी कर बाबू के कानों में बोलती है – “पता है दिमाग में क्या होता है?”
बाबू मुस्कराकर जबाब देता है, “तुम्हे पता है क्या ?”
स्नेहा मुड़ जाती है मानो अचानक ही ऊब गई हो |
बाबू के दिमाग में कोई घनघोर ख्याल चल रहा था जिसे बिना बोले स्नेहा समझ गई और उसे बाबू के नादान खुराफाती मिजाज की उपज मानकर हसने लगी | मगर शायद यह नादान ख्याल छुटकी के लिए काफी भाड़ी पड़ा और वह एक्बैक उठकर रोने लगी |
कल के अखबार में आया था कि इन्सान के दिमाग का चित्र किसी मशीन से निकला गया है | देखने में ऐसा लगता है मानो तेज भागते बादलों में किसी ने रंग मिला दिए हों |

(  नौ  )

गंगा घाट – संध्या का वक्त – सूर्यास्त में कुछ घंटे बाकी हैं |
बाबू कुछ अन्य लोगों के साथ एक बड़े यात्री नौका पर सवार होकर, नदी के बीच किसी रेतीले टीले पर जा रहा है | वैसे तो उन टीलों पर लोग परिवार या दस्तों के साथ सैर-सपाटा करने जाते हैं, मगर बाबू अकेला हीं जा रहा था | नौका पर और कोई उसका परिजन न था | एक मोटी औरत कोई लोक गीत गाकर सबका विहार आनंदमयी कर रही थी और बाबू किसी ख्याल में खोया किसी दिशा में देख रहा था |
यह रेतीले टीले सिर्फ गर्मियों में नदी से उभर कर दीखते हैं – फिर वर्षा ऋतु आती और इन्हें वापस डुबो देती |
नौका टीले पर पहुँच गई | बाबू उतरते हीं एक दिशा में किसी धुन में चल देता है, लोगों के कोलाहल से दूर | थोड़ी देर में जब सूर्यास्त का समय होने लगता है, लोग नौका पर वापस रवाना हो जाते हैं | बाबू नहीं जाता – किसी तरह छिप-छिपाकर खुद को बचा लेता है | टीला अब खाली है और बाबू इतमिनान |
सूरज डूब चूका है आसमान को अपने रंग का छोड़कर – शीतल हवा बह रही है, पानी छप-छप की ताल देते हुए | बाबू शांत सा, इधर-उधर देखते हुए कहता है, “हे महान आत्मा, मुझे दर्शन दे, मैं तारा का तारा टाइम मशीन का पता लगाने के लिए आया हूँ” | हवा का बहाव तेज हो जाता है | बाबू मुड़कर किसी को देखता है | रेत पर किन्ही पैरों के निशान को हवा वापस लुप्त कर रही है | अँधेरा बढता ही जा रहा है |
कुछ देर में सब कुछ अँधेरे में समा जाता है, सारी ध्वनियाँ भी !
फिर बाबू को अपने मन में अपनी छाया दिखती है | पीछे कला अँधेरा है मगर बाबू पालथी मर कर रेत पर बैठा हुआ है | ध्वनियाँ वापस सुनाई देती हैं |
सुबह हुई तो बाबू उसी रेत के टीले पर लेटा हुआ था | दूर से एक नौका आ रही थी, शायद टीले से पटना शहर का सूर्योदय देखने | नौका पास आई तो बाबू ने देखा कि यह तो उसके ही परिवार के लोग हैं | बाबू चुपके से जाकर उनके कोलाहल में मिले गया | नौका वापस गई तो बाबू भी वापस चला गया |
कुछ दिनों में बारिश झकझोर होने लगी – टीला डूब गया | बाबू का बड़ा मन था डूबे हुए टीले पर जाकर अपने अदृस्य गुरु से मिलने का – मगर गुरु ने उसे मना किया था | वह बस नदी के इस पर से टीले को डूबता हुआ देखता हीं रह गया |

(  दस  )

घर में एक छोटा मंदिर हैं जहाँ अदृस्य शक्तियों को छवियों में रखा गया है | ऐसी हीं एक छवी यानी चित्र से बाबू ने छेढ़कानी की थी और उसे उसकी सजा भी मिली | अदृश्य को दृश्य में बांधने का क्या मतलब है ? कोई मतलब तो ज़रूर होगा ! जब बाबू का सर छमा-याचना के लिए मंदिर में झुकाया गया तो उसने परंपरा के अनुसार आँखें बंद न की | वह वापस उठ उन चित्रों को देखने लगा |
अगर आँखें बंद हीं करना था तो यह चित्र बनाए क्यों ?
“तारा का तारा टाइम मशीन” भी शायद इन्ही जैसी किसी सिद्धांत पर चलती हो ! समय तो शायद हकीकत भी नहीं क्योंकी उसकी परिभाषा इन्द्रियों के हकीकत से परे है |
मगर टाइम मशीन है तो ज़रूर !
शायद इतिहास में कभी-कभी ऐसा होता हो | माया और महामाया के बीच कोई दरवाज़ा अचानक ही खुल जाता हो | या फिर ब्रह्म किसी कारणवश अपने को इस संसार में प्रदर्शित करता हो !
बाबू को पक्का विश्वास था – “तारा का तारा टाइम मशीन” है तो ज़रूर ! शरीर सहित आत्मा नहीं तो कम से कम एह्सासों के मन को तो समय की सैर करवा हीं सकती होगी ! ...यह क्या सोच रहा हूँ मैं ? ...यह तो अधूरा सच है, माना की मनोप्रवृति है मगर... ”

(  ग्यारह  )

धरती आकाश का प्रतिबिम्ब है ! बादल मन के ख्याल और तारे नींद के सपने | बादलों की गिनती तो नही कर सकते मगर किसी पागल वैज्ञानिक ने खुद आंकड़ों से पता लगाया है कि अंतरिक्ष में उतने हीं तारे हैं जितने दुनिया में लोग |
जब गुटलू ने बड़ी मुश्किल से अपनी उचाई से काफी ऊपर टंगी मंदिर की घंटी बजाई तो मानो घंटी की आवाज़ पूरी होने के पहले हीं थम गई और घर के सारे लोगों ने उसे पकड़ कर टेलीवीजन पर बैठा दिया | किसी खराबी के कारण टेलीवीजन नहीं चल रहा था कुछ दिनों से, अब चलने लगा | रंग के बाद एक आते गए और लोग विस्मय पूर्ण आँखों से उसमे डूब गए | काफी देर तक यह सिलसिला चला मगर फिर बत्ती चली गई | गुटलू ने चैन की सांस ली और खुद को टेलीविजन से नीचे उतारा | वह बड़े गुस्से में था और सीधा जाकर बाबू से हाथापाई करने लगा | यह हाथापाई देखने के लिए पूरे परिवार के लोगों ने भीड़ लगा दी थी |
बत्ती नही होने के कारण रात के पहर सब लोग छत पर सोए हैं | बाबू और स्नेहा अगल-बगल लेटे हैं, पास में एक ढिबरी जल रही है और आसमान में अनगिनत या फिर गिनत तारे टिमटिमा रहे हैं |  
बाबू ने कहा, “अगर कोई इनमे से एक तारे को बहुत देर तक एक टक में देखे तो वह समय कि सैर कर सकता है – समय में किसी और समय पहुँच सकता है |”
शायद खामखा कोई ख्याल था कि अगर एक तारे को रात भर देख लो तो समय के किसी और छोर पर पहुँच सकते हो | तारो की दुनिया में समय की कोई रेलगाड़ी हो जैसे | न जाने कितनी बार कोशिश की होगी, मगर सैर की तो सिर्फ सपनो की |
बड़ी अनोखी बात थी, दोनों अपने अपने तारों को एक टक में देखे जा रहे थें |
सुबह के वक्त स्नेहा तो सो रही है मगर बाबू उसी तरह जगा है, बिलकुल शांत | दादी माँ अपने बाल झार रही हैं और उनका छोटा आईना बाबू के पैरों के पास रखा है | इस आईने ने बादल देश के एक टुकड़े को खुद में कैद कर लिया है |
माँ तुलसी के गमले में कलश से पानी डाल रही थी | कुछ एकआत फूल भी तोड़े दूसरे गमलों से, एक टूटे गमले के गिरे कोने को वापस उसकी जगह पर खड़ा किया, फिर अपने पूजा की थाली के साथ चली गईं |
कलश से गिरे पानी ने छत पर थोड़े जमा पानी को मटमैला कर दिया था जिससे बाबू बार-बार गुजरते समय छपाक कर जाता था |

(  बारह  )

सुबह के आठ बज रहे होंगे - सारे लाउड-स्पीकर जग चुके थें | एक ने अपनी आवाम से कहा, “सर के बल चलो, पे पे पे, गुनाहगारों, सर के बल चलो... पांव रखना भी गुनाह है, मुहम्मद के शहर में | दूसरा भी अपनी खरखराती आवाज़ में चिल्ला रहा था, “राम राम राम राम २०१, राम राम राम राम २०२ | बाबू जब स्कूल पहुँचा तो वहाँ भी एक लाउड-स्पीकर था जिसकी गूंजती आवाज़ में बाबू बाकी बच्चों के साथ पंक्तिबद्ध खड़ा था – “ओ माइ फादर इन हेअवन....” ऐसा कुछ बोल रहा था वह लाउड-स्पीकर |
कक्षा के कोलाहल में बाबू कहीं बैठा कुछ सोच रहा था | अनुशासन का घंटी बजी - मास्टर जी के आते ही सब बच्चे शांत हो गए |
मास्टर जी ने बाबू को खड़ा करके उससे पूछा, “बताओ हम किस शहर में रहते हैं ?”
बाबू ने झट से जबाब दिया, “सर, हम चम्पक नगर में रहते हैं |”
मास्टर आगबबूला हो गया, सारे बच्चे हँस रहे थें | उन्होंने अलमारी के ऊपर से एक नक्शा निकाला और बाबू के सामने रखते हुए कहा, “बताओ चम्पक नगर कहाँ है !” बाबू ने ऊँगली उठाई और नक़्शे में बनी एक बिंदु पर रख दिया | सबने देखा – चम्पक नगर वहीं था !
मास्टर जी मन ही मन घबराकर सोचे, “यह भला कहाँ का जादूगर है ?”
बाबू ने मन ही मन मास्टर से कहा, “चम्पक नगर का !”

(  तेरह  )

रात के किसी पहर बाबू के नींद खुली – ऐसा लगा मनो वह किसी अँधेरी दुनिया में अपने बड़े पलंग पर सोया है – आस पास कुछ भी नहीं और कोई भी नही | दूर कहीं एक तारा दिख रहा है | बाबू अपने पलंग से उतरकर उसकी ओर बढ़ना शुरू करता है | आखिर क्या है वह रौशनी का टुकड़ा – किसी अँधेरी गुफा का मुँह , कोई खिड़की, कोई बल्ब ? अँधेरे में कुछ पता नहीं चल रहा था कि वह क्या है और कितनी दूर है |
न उसकी पलके झपकी उस नूर से, न उसने चलना बंद किया ... कई घंटे बीत चुके थें और फिर अचानक वह तारा गायब हो गया | बाबू ने बड़े इतमिनान से खुद को कहा, “आखिर पकड़ ही लिया !” और मुस्कराने लगा | फिर वह वापस जाकर पलंग पर सो गया – न इधर देखा, न उधर, बस सो गया |

(  चौदह  )

खिलौने कि गाड़ियों कि एक लंबी कतार देवी माँ के फोटो तक जाती हैं – वहाँ मंदिर में जब गुटलू ने घंटी बजाई तो माँ उसे झट से पकड़कर घर ले आई और फिर से टेलीवीजन पर बैठा दिया | इतने दिनों से जो बंद था , सो फिर चल पड़ा | दादी माँ ने कहा, “माता का आशीर्वाद नहीं तो और क्या है ?” सब लोग आँखें फाड़कर टेलीवीजन देख रहे थें मानो किसी तांत्रिक के वश में आ गए हों | इधर गुटलू को बड़ा गुस्सा आ रहा था टेलीवीजन पर बैठे बैठे | उसने घंटी बजाई तो क्यों बजाई ?
इतने में कमरे के पीछे से बाबू गुजरा – गुटलू ने सोचा, “यह बाबू कभी घंटी क्यों नहीं बजाता ?”
यह सोचकर गुटलू का गुस्सा दोगुना हों गया – वह लपककर कूदा, टेलीवीजनका सिग्नल टूटा, और दुसरे हीं पल गुटलू और बाबू हाथापाई कर रहे थें | टेलीवीजन के सारे दर्शक इस ओर घूम गए, उन्होंने देखा तो सोचा – यह प्रोग्राम बी बुरा नहीं है !

(  पन्द्रह  )

स्नानघर में एक आसमानी रंग की बहुत बड़ी एक बाल्टी थी – नल खुला था और पानी उन्मुक्त धारा में बह रहा था | इस बाल्टी के अंदर बाबू है जो सांस रोकने की साधना कर रहा है | अभी तक उसके सांस रोकने की कला ने समय की सीमा बहुत अधिक पार न की है |
इस कला में अभ्यस्त होने के बाद बाबू उस सड़क पर जाता है जहाँ बारिश के पानी से बाड़ आ गई है | गंगा अपनी सीमा से बहुत आगे है | बाबू पानी के अंदर चलकर अपने अदृस्य गुरु की गुफा में जा पहुँचता है – उनके आज्ञा के विपरीत | गुरु क्रोधित नहीं होते हैं बल्कि अपने शिष्य के नादान कौतूहल पर मुस्करा देते हैं | यह दुनिया मानो कोई कल्पना की दुनिया है !
अदृश्य गुरु : तुम्हारे यहाँ आने से मुझे कोई संकोच नहीं मगर शायद तुम्हारे मन को वापस जाना पड़ेगा | ऐसा नहीं हुआ तो काफी अनहोनी हो जाएगी इस नियम-बध्य संसार में | तुमने अपनी साधना से नियम तो तोड़ दिया हैं मगर फिर भी तुम्हे इसकी इज़ाज़त नहीं है | अगर “तारा का तारा टाइम मशीन” जानना चाहते हो तो मेरी बात माननी पड़ेगी |
बाबू : मैं आ तो गया हूँ और आपके इस कथन से थोड़ा निराश हूँ – थोड़ा निराश हूँ, ज्यादा नहीं – गुरु की आज्ञा स्वीकार है , मगर मैं जाऊँ तो कैसे, मुझे रास्ता मालूम नहीं |
अदृश्य गुरु : तुम “तारा का तारा टाइम मशीन” के निर्माता के सामने खड़े हो | यह भी कोई मुश्किल है उसके लिए ?
बाबू को उस कल्पना की दुनिया में अपना पलंग दिखा और वह उसके नीचे जाकर सो गया |
इधर पूरे शहर में बाबू को लोग खोज रहे हैं | सबको शायद थोड़ी भनक थी की बाबू यन्त्र-तंत्र में विश्वास रखता है और शायद छट पूजा में पूरे शहर की सड़कों पर बने किसी चित्र में गायब हो गया है | उधर एक तांत्रिक की मदद से पुलिस वालों ने मुझौसा भूत को भी पकड़ लिया है |
इंस्पेक्टर : बताओ बाबू कहाँ है ?
भूत : ह्ह्हूऊउन्न्नाआआआहूउहुआआ......
इंस्पेक्टर जोर से अपनी लाठी भूत पार चलाता है | भूत भी दर्द से करहाता है |
इंस्पेक्टर : इंसानों की तरह नही बोल सकते ?
भूत (रोते हुए) : मुझे नहीं मालूम !
इधर बाबू के घर पर – जीवन सामान तौर पर चल रहा है | बाबू पलंग के नीचे छुपा है | वह एक तरफ मुड़ता है और चुटकी बजाता है – यह कहानी खत्म हो जाती है |


कविताएँ


किसी अनजानी दुनिया का बेखबर मुसाफिर
बेतरतीब फिरता दरबदर
जाने क्या सोच कर ?
यह कौन सी गलियाँ हैं
वह कौन सा शहर,
क्या फरक और कैसी फिकर ?

कोई रास्ता होता तो शायद भटक जाता,
मगर यह तो दुनिया ही अनजानी है !
दिशाहीन, बिना ओर-छोर की पहेली
मानो कोई मन मानी कहानी है !

समय सीढ़ी पर चलता है,
चलने वाला किसी नक़्शे पर  
हर ख्याल का मनो अपना एक मन हो,
हर ख्याल का अपना पागलपन हो

इन्ही ख्यालों के कमरे मे बंद है,
बिना छत का यह मुसाफिर 
बंजारा फ़िराक मे कुछ खोजता
यह अनजाना मुसाफिर ...
...
माया की नगरी मे पैर हैं
और मन है कोई माया
बेतरतीब सच है
यह बेतरतीब माया
इतिहास भी कहानी,
एहसास भी कहानी
कहानियों का सच,
कहानियों का झूट
जो सिधांत से छूटा
उसका नाम भूत

फिर होश को बादलों मे रख दो
और तारों मे सपने
इस भूत की मनो
तो जूझ लो ख्यालों से -
कितने  भी बेतरतीब हो
है तो अपने 

...

कुछ भयानक सा अंदर छुप कर बैठा है
मेरे अंदर
मन में
या शायद शरीर में
या फिर आत्मा में
कुछ छुप कर बैठा है
कोई डर
दिल की कोई देह्शत
ठेस
लाचारी
बड़े प्यार से
हलके से तड़पाता है
आता है, जाता है
कुछ चंद पलों के लिए बस
जब मन
या कल्पना
या आत्मा
पूरी दुनिया घूमकर
खुद पर लौटती है 
यह दर्द
या मोहब्बत
या मायूसी
या ख़याल
यह महसूस होता है
खालीपन सा
बिना किसी रूप का
न कोई चेहरा
खुद से बड़ी हमदर्दी होती है
मुझे
उन कुछ पलों में
...
बचपन के उन दिनों का
वह बिस्तर के नीचे छिपा भूत
आज भी वहीं रहता है
मगर बड़ा आलसी हो गया है,
न बारह बजे रात को टहलने निकलता है
न पलंग की लकड़ी खुरेदता है,
न बर्तनों से चौकाने वाला शोर करता है
न नींद से उठाने वाले सपने दिखाता है
सिर्फ बिस्तर के नीचे छिप कर रहता है
बेजान सा
आलसी भूत
...



खत्म
और कोई विस्फोट
किसी वस्तु का नहीं
कुछ और था वह
जिसके टुकड़े हवा में तैर रहे थें
कोई देख नहीं सकता था
मगर हवा में तैर रहा वह
सांसों में है
शरीर में है
क्या है
वह टूटता,
क्या बर्बाद हो रहा है
यह जहाँन ?
क्या है वह
आसमान
क्या ज़मीन है ?
ईमारत की ईंटों में मेरी रूह
सो रही समेंट ओढकर
रास्तो पर, गलियों में  
भागती है वह
बर्बाद हो रहा
पल भर भर हर पल
ख्याल कोई
नेक होगा जो
इस संगमरमर की चमक में
रोटी के सौंध से
पसीने से
हकीकत में
वह कुछ नहीं
कुछ भी नहीं
ना नाम
ना रंग
ना शब्द
ना चेहरा
ना मैं
ना तुम
ना कोई
...

मैं कैसा इन्सान बन गया हूँ
मेरी बातें
ना अफसाना, ना हकीकत
मेरी बातें क्या हैं ?
क्यों इतना ऊबा सा है मन
दुनिया से
और क्यों कोई वजूद नहीं
ख्याल का इस दुनिया में
अपनी परछाई की आदत सी पड़ गई है
वह भटकती है
छितराई रोशनियों के जोर से
मैं फिरता हूँ
कदम दर कदम
दोस्तों के साथ
मैं भटकता हूँ
वह चलते हैं
कला क्या मालूम पड़ती है ?
दुनिया में इतनी बातें हैं हर जगह
सच्चाई की खोज पर कौन निकलता है ?
वह सब कुछ समझते हैं
मुस्कुराते हैं , हँसते हैं
और मैं
सोचता हूँ
सिर्फ सोचता हूँ
कुछ बोलता हूँ तो लाज रखने के लिए
सभ्य मालूम पड़ने के लिए
मैं गूंगा नहीं हूँ यह बतलाने के लिए
मुझे भी महसूस होता है
दिखलाने के लिए
मगर
मुझे दुःख है
अपने शब्दों का
मैं आज़ाद होना चाहता हूँ
वह आज़ाद नहीं होने देते
और मैं खोज में पड़ जाता हूँ
अपनी ईमारत की खोज में
रात के बिस्तर की
भूक की
एक ने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ से आया हूँ
दूर पूछता है मैं ऐसा क्यूँ हूँ
मैं भी खुद से पूछता हूँ
मैं क्या हूँ 

...

उसका रंग रात का है
उसका शरीर मेरे मन में काला
आँखें सपनो की कोई डरावनी बात कहती हैं

इतना खूबसूरत तो सिर्फ अँधेरा हो सकता है
वह भी शायद किसी अँधेरे में रहती है
अनकही सी लगती है

कमरे में गूँजती उसकी साँसे
और मुझे देखती उसकी आँखें 

उसे कुछ नहीं मालूम है,
खुद के बारे में
दुनिया में अफवाहें हैं
और मेरे अंदर मुहब्बत  


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